वैचारिक प्रवाह

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ क्शचिद दुःखहारभवेत

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ashvinikumar


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अभी फुलझड़ी पटाका बाद मे

Posted On: 31 Mar, 2013  
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जब सइयाँ भये कोतवाल फिर डर काहे की

Posted On: 7 Mar, 2012  
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आग्रही लेखन अथवा हठ्वादिता

Posted On: 1 Mar, 2012  
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दस्तक

Posted On: 24 Feb, 2012  
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15 अगस्त पर विशेष कोटिशः नमन शहीदों को

Posted On: 15 Aug, 2011  
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अमेरिका,,चीन,,पाकिस्तान और भारत —

Posted On: 12 May, 2011  
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भारत में लोकतंत्र या विवशतन्त्र ?

Posted On: 4 May, 2011  
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लादेन एक सवाल अनेक :-

Posted On: 3 May, 2011  
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भारतीय संस्कृति के लिए दो शब्द

Posted On: 1 May, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय महोदय, सादर अभिवादन! आखिर एक साल २३ दिन बाद आपने अपने घर का रुख किया ...वह भी एक अप्रैल से पहले वाले दिन ...अब इतनी हिम्मत नहीं है, कि भाई जी को कहूं लौट के .... घर को आये! काश और काश (घास) को परिभाषित करने वाले महोदय को भला, ...मै दूब ही तो हूँ! भैया जी, अपने फुलझड़ी अभी छोड़ी है ...पर ये अक्षर फुलझड़ी की तरह कभी दीखते हैं कभी न भी दीखते हैं .. बड़ी कोशिश के बाद चश्मे का नंबर बढ़ा कर पढ़ने की कोशिश में नीचे वाली लाल लाइन पढ़ सका इससे आज की राजनीति के घटिया शक्ल ही नजर आयी. जर, जोडू और जमीन के बाद कुर्सी की मत्त आपने बड़ी बेहतर बताई ... आज तो सभी इसी कुर्सी को हथियाने के फ़िराक में हैं चोंच से चोंच लड़ाना पड़े या और कुछ...... अब पटाखे का इंतज़ार रहेगा! हो सकता है यह प्रतिक्रिया आपको तुरंत न दिखे तो स्पैम को अप्प्रूव कर लीजियेगा! सादर आभार! पर मुखौटा तो हटाइए सर जी!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: ashvinikumar ashvinikumar

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स्नेही राजकमल जी यह आज का ही परिदृश्य है ,,चीन अभी भी भारतीय सीमाओं और लगातार निर्माण करवा रहा है पाक अधिकृत काश्मीर में चीनी सैनिकों के जमावड़े हैं ,,नेपाल में पूरी तरह से वह हावी है,,भारत कहां है ,बस चुनाव कुत्षित राजनीति ,,आज बंगाल और आसाम में एक वर्ग का मतदाता क्यों इतना अधिक बढ़ गया भारत शरणार्थियों एवं अवैध प्रवासियों के खिलाफ इतना नर्म रुख क्यों अपनाता है,,सीखें लिखते समय मन आक्रोशित हो जाता जिसके कारण शाब्दिक लयबद्धता हट जाती है ,,ऐसे मामले हैं जिन पर हम आक्रोशित ही हो सकते हैं ,,मसलन हमारा वोट का अधिकार हम जनप्रतिनिधि चुन सकते हैं लेकिन कहां चुन पाते हैं ,,मेने वोट दिया एक देश भक्त को वह जा मिला रास्त्रद्रोही से तो क्या हमने रास्त्र द्रोही को मत दिया यह लोकतंत्र है या लोगों को बेवकूफ बनाने का हथियार इस अचूक अस्त्र का तो स्वतंत्रता के बाद से ही बहुताय उपयोग हो रहा है और लोग बन रहें हैं....जय भारत

के द्वारा:

भारत किसी समय अत्यधिक धनि था पर अकर्मक कभी नहीं था , बड़ी नादानी से लोग अमेरिका का गुण गान करते है पता नहीं क्या अमेरिका का खाया है जो उसके सही चेहरे से वाकिफ होने बजाय उसीके पिठू बने लोग क्या कभी आगे बढ़ पाएंगे | आप क्या कभी पाश्चात्य देशों में गए है अभी भी गोरी चमड़ी बालो के मन में नस्ल वाद प्रखर है | केवल पैसा पाने से कोई कैसे आग उगलता है यह बच्चों जैसी बातें पता नहीं कौन सोच सकता है | जब भी भारत व् पाकिस्तान का सत्यानाश होगा तो अम्मेरिकी हत्यारों से होगा पाकिस्तान का अवाम व् हुक्मरान नहीं जनता कि भारत जिसके लिए वह हमेशा विष के बीज बोता है वह उसकी किस्मत आज भी बदलने का माद्दा रखता है यदि वह अपनी करतूत छोड़ दे व अंकल सैम को अपना खैर ख्वाह न समझे | पता नहीं लोग इस बात से क्यों खफा हो गए कि अमेरिका सबसे स्वार्थी है जब हर चीज में हर देश तुलनात्मक रूप में कम ज्यादा हो सकता है तो यह कह देना कि सभी स्वार्थी होते हैं सही तर्क नहीं है |

के द्वारा:

ओसामा कैसे मरा ?, एक कल्पना प्रिय ashvini जी ! सच क्या है ? इस बारे में मीडिया तो हमारी कोई मदद करेगा नहीं क्योंकि वह झूठ बोलने वालों के हाथों में जो है। हमने उर्दू में एक लंबा धारावाहिक नॉवेल अब से 24 साल पहले पढ़ा था, उसका नाम था ‘देवता‘ और उसे लिखा था ‘मुहयुद्दीन नवाब‘ ने। यह लेखक भी पाकिस्तान के ही हैं। एक नॉवेल में 250 से लेकर 350 पृष्ठ होते थे और उसकी हमने 21 क़िस्तें तो पढ़ी हैं। उसमें इंटरनेशनल पॉलिटिक्स को अच्छी तरह समझाया गया है। उसके आधार पर अगर हम ‘ओसामा एनकाउंटर‘ को एक्सप्लेन करने की कोशिश करें तो वह कुछ यूं होगा कि ‘अमेरिका ने ओसामा को अफ़ग़ानिस्तान से बिल्कुल शुरूआती दौर में ही पकड़ लिया था। उसके गुर्दे फ़ेल थे। अपने बेटे की तरह वह भी समझ चुका था कि हथियार किसी समस्या का हल नहीं है। उसकी हथियार क्रांति का लाभ भी अमेरिका और यूरोप की हथियार बेचने वाली कंपनियों को ही मिल रहा था, मुस्लिम मुल्कों को नहीं। अमेरिका नहीं चाहता था कि ओसामा के आतंक को तिल से ताड़ बनाने में जो मेहनत उसने की है, उस पर ओसामा बिल्कुल पानी ही फेर दे और फ़िल्म ‘दादा‘ का सा कोई सीन क्रिएट हो। उसने ओसामा के लिए एक रिहाइश बनवाई और उसकी दीवारें इतनी ऊंची बनवा दीं कि कोई अंदर से बाहर जा न सके। यह कोठी ही उसके लिए जेल थी। उसके बीवी बच्चे उसके साथ थे और उन सब पर कमांडो तैनात थे। इसी कमरे में ओसामा के वीडियो अमेरिका शूट करता था और वही इन्हें सारी दुनिया में फैलाता था। इस तरह अमेरिका ही अलक़ायदा के नाम से दुनिया में आतंक फैला रहा था और ओसामा अपनी बीवी और बेटियों की इज़्ज़त की ख़ातिर अमेरिका की वीडियो फ़िल्मों में ‘एक्टिंग‘ कर रहा था। यहां तक कि डॉक्टरों ने बता दिया कि अब ओसामा केवल कुछ घंटों का ही मेहमान है। आनन फ़ानन अमेरिकी सद्र को इत्तिला दी गई और उन्होंने ओसामा की मौत के परवाने पर हस्ताक्षर कर दिए। वहां से ओसामा पर तैनात कमांडोज़ को हुक्म दिया गया कि ‘किल हिम‘। कमांडोज़ ने मृत्यु शय्या पर लेटे ओसामा के सिर में गोली मार दी और फिर बाद में आने वाले विशेषज्ञों ने उसका मेकअप करके मुठभेड़ में मरा हुआ सा रूप भी बना दिया। उसके फ़ोटो खींचे गए जैसे कि चांद पर जाने की झूठी फ़ोटोग्राफ़ी की गई थी। मुठभेड़ फ़र्ज़ी न लगे, इसके लिए दो-तीन और लोग भी मार दिए गए। जिस हैलीकॉप्टर में यह सब सामान ले जाया गया था, उसे सुबूत नष्ट करने के उद्देश्य से नष्ट कर दिया गया ताकि बाद में भी कोई खोजी सच का पता न लगा सके। तकनीकी ख़राबी आने के कारण क़ीमती हैलीकॉप्टर नष्ट करने का रिवाज कहीं भी नहीं है, हर जगह उसकी मरम्मत ही कराई जाती है। ओसामा ज़िंदा भी अमेरिका के काम आया और उसकी मौत को भी अमेरिका ने भुना लिया है। यह है ‘अमेरिका का इंसाफ़‘, जिसे हरेक बुद्धिजीवी देख भी रहा है और समझ भी रहा है। जो भी एशिया के किसी भी क्षेत्र की मुक्ति के लिए पश्चिमी शक्तियों से लड़ा, उसके साथ उन्होंने यही किया है। ओसामा के मामले में दुनिया खुशनसीब है कि उसे पता चल गया कि वह अब नहीं रहा लेकिन सुभाषचंद्र बोस के बारे में हम इतना भी नहीं जान पाए। पाकिस्तानी हुक्मरां शुरू से ही उसके साथ हैं, जैसे कि हमारे हुक्मरां भी आजकल उसके ही साथ हैं। जो उसके साथ नहीं है, उस पर वह बम बरसा ही रहा है। बड़ा मुश्किल ज़माना है कि लोगों ने समझदारी यह समझ रखी है कि अपने होंठ सी लिए जाएं। इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के बारे में हम यही कह सकते हैं कि ‘जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता।‘ ओसामा कैसे मरा ?, एक कल्पना The Imagination

के द्वारा:

स्नेही एस० पी० सिंह जी,,देखें भारत क्या कर रहा है ,,वर्तमान वित्त मंत्री ने अमेरिकी राजदूत तिमोथी रोमर से कहा कि यदि केवल दक्षिण और पश्चिम भारतीय ही होते तो देश की वृद्धि दर अधिक होती, क्योंकि शेष हिस्से के लोग देश को पीछे धकेल रहे हैं ,,यह तो भारत का रुख देश के प्रति है ,,,अब पाकिस्तान का रुख देखिए ,,ग्वांतेनामो जेल में बंद दुनियाभर के आतंकियों से पूछताछ में 5कैदियों ने पूछताछ में कहा कि आईएसआई भारत में आतंकियों को घुसने की अनुमति देती है और उन्हें पाकिस्तानी सेना के बताए ठिकानों पर हमले करने होते हैं कश्मीरियों की हत्या, अपहरण और वहां बमबारी करने के निर्देश भी उन्हें पाक सेना से ही मिलते हैं।....जय भारत

के द्वारा:

भाई अश्वनी जी एवं स्नेह्यी श्री मिश्र जी मैंने यह कभी नहीं कहा की हम या हमारा भारत कभी कमजोर रहा है या आगे भी होगा मेरा मंतव्य या कहें की सोच इतनी से है की 1971 में इसी पाकिस्तान को चीर कर हमारी फ़ौज ने दो टुकड़ों में कर दिया था और लगभग एक लाख सैनिक एवं असैनिक कर्मचारियों को बंधक बना कर कितने वर्षों तक दावत भी खिलाई थी और फिर सैनिकों के बलिदान के बाद जीती हुई जमीन एवं इन एक लाख नागरिकों को सकुशल वापस भी भेज दिया था इस लिए केवल युद्ध या सिमित युद्ध (जैसा की कारगिल में लड़ा गया था ) क्या वास्तविक विकल्प हो सकता है मेरे विचार से नहीं - और न ही भावनाओं के द्वारा ही समस्या हल हो सकती है - जहाँ तक हमारे नेताओं की बात है न तो नेता युद्ध लड़ते हैं और न ही देश चलाते हैं नेता केवल देश को लूटते हैं. जहाँ तक देश चलाने की बात है वह सब ब्यूरोक्रेट ही चलाते है और आगे भी चलेगा - आपदोनो सज्जनों के विचार बहुत ही उत्साहवर्धक है आशा है आगे में ऐसे ही आदान प्रदान होता रहेगा -- आपदोनो का धन्यवाद

के द्वारा:

आदरणीय एस पी सिंह जी, नमस्कार । आपकी बात से सहमत हूं कि पाकिस्तान को पालने में अमेरिका के अपने राजनैतिक और सामरिक हित हैं लेकिन इस बात से सहमत नहीं हूं की अगर भारत भी अमेरिका की देखा देखी पाकिस्तान पर सर्जिकल अटैक करता है तो विश्व समुदाय भारत का विरोध करेगा । लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने से पूर्व अलकायदा के सभी बड़े आतंकी पाकिस्तानी शहरों में पकडे़ गये थे और लादेन की मौत के बाद तो पूरा विश्व पाकिस्तान से जवाब मांग रहा है कि लादेन एबेटाबाद में पिछले 5 साल से कैसे ऐश कर रहा था । जाहिर है इसमें पाक फौज और आईएसआई का पूरा सहयोग था । यहॉं तक कि सन 2002 में ही मुर्शरफ को लादेन के बारे में पता चल गया था क्योंकि उनका उस वक्त का एक बयान है कि लादेन को किडनी में दिक्कत है । किडनी के मरीजों को 7 दिन में डायलिसिस करवानी पड़ती है और वह पाकिस्तान के किसी बड़े शहर में ही हो सकती थी । यानी लादेन सन 2002 से ही पाकिस्तान का सरकारी मेहमान था । ऐसे में आज विश्व समुदाय पाकिस्तान के पक्ष में भारत के खिलाफ खड़ा होने से रहा । . अब आते हैं आपकी इस शंका पर की पाकिस्तान समर्थक गद्दार लोग भारत-पाक युद्ध के समय पाक के लिये दंगे करवा देंगे, तो मुझे इस सोच पर हंसी आती है क्योंकि आपके ही सामने भारत पाक के कितने युद्ध हुये होंगे, आप ही बतायें कि कितनी बार देश में युद्ध के दौरान दंगे हुये, मेरे सामने कारगिल हुआ था, मुझे नहीं याद पड़ता कि ऐसा कुछ हुआ था, बल्कि देश में राष्ट्रप्रेम की अभूतपूर्व लहर देखने को मिली थी । फिर ऐसे वक्त पर एक कानून होता है जो युद्धरत देश यानी शत्रु देश से न सिर्फ सरकारी बल्कि सिविल स्तर पर भी हर सम्बन्ध को खत्म कर देता है और इस तरह का सम्बन्ध रखने वालों पर कड़ी कानूनी कारवाई होती है । इसलिये यह दलील तो कोयी मानेगा ही नहीं । . अब आईये पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति पर । पाकिस्तान के साथ यही सबसे बड़ी कमजोरी है की वह चाहे अमेरिका जितना शक्तिशाली क्यों न हो जाये वह अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा मार खायेगा । पूरे पाकिस्तान की चौड़ाई ही भारत की सीमाओं से 100 से 500 किलोमीटर के बीच है । इसके अलावा पाकिस्तान के सभी महत्वपूर्ण बड़े शहर भारत से मुश्किल से 150 किलोमीटर के अंदर आ जाते हैं । इसके अलावा पाकिस्तान के चार प्रांतांे में से दो पर तो उसका नाम मात्र का शासन है । जो मुख्य प्रांत हैं वह हैं पंजाब और सिंध जो कि भारत से सटे हुये हैं । युद्ध की स्थिति में (जैसा कि सन 1965 में लाल बहादुर ने किया था, भारत की सेना बहुत तेजी से उनके कई महत्वपूर्ण शहरो तक पहुंच गयी थी और पाक फौज की हालत भीगी बिल्ली जैसी हो गयी थी) भारतीय सैना को इन दोनों प्रांतों के महत्वपूर्ण शहरों तक पहुंचने में अधिक से अधिक 10 से 15 दिन लगेंगे । ऐसा पहले भी हुआ है । इसके आलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान और अगानिस्तान से सटे प्रांत, जहां उसका नाम मात्र का शासन है में पहले से ही अलगावादी शक्तियां आंदोलन चला रही हैं पाकिस्तान से अलग होने के लिये । ऐसे किसी भी युद्ध में बंग्लादेश की तरह पाकिस्तान के कम से कम 3 और टुकड़े होने की प्रबल संभावना है । जहॉं तक पाकिस्तान फौज से डरने की बात है तो जो फौज अपने ही देश में रोज हो रहे आतंकी हमलों को नहीं रोक सकती । जिसका अपने ही देश के दो राज्यों पर कोयी प्रभाव नहीं है । जो बात बात के लिये अमेरिका से हथियारों की भीख मांगती हो वह भारत की सेना का मुकबाला 15 दिन भी टिक कर नहीं कर सकती है और यह बात तो स्वंय जनरल कियानी ने अभी सन 2011 में ही स्वीकार की थी की पाकिस्तान सीधे हमले में भारत का मुकाबला नहीं कर सकता है । . अब आते हैं पाकिस्तान की न्यूक्लियर धमकियों पर । इस बात में कोयी संदेह नहीं है कि अगर भारत-पाक में न्यूक्लियर युद्ध होता है तो पाकिस्तान पूरा और भारत के कई बड़े शहर खत्म हो सकते हैं । ऐसा युद्ध आत्मघाती पाकिस्तान तो हो सकता है पागलपन में लड़ जाये लेकिन भारत की सरकार बहुत सोच समझ कर ही लड़ेगी । न्यूक्लियर धमकी ही पाकिस्तान को न सिर्फ भारतीय बल्कि अमरीकी हमलों (इराक,लीबिया की तरह) से भी रक्षा करती है । . भारत सरकार अगर निश्चय करले तो पाकिस्तान जैसे पिलपिले देश को मिटाने के लिये एक गोली भी चलाने की नौबत नहीं आयेगी । जो देश दीवालिया होने की कगार पर खड़ा हो, जिसके पास कामलायक विदेशीमुद्रा भी न हो वो एक छोटा सा भी युद्ध नहीं लड़ सकता । संसद पर हमले के वक्त एनडीए सरकार ने बिना युद्ध लड़े ही पाकिस्तान को एक युद्ध से भी अधिक नुक्सान दे दिया था । आपको याद होगा पाकिस्तान एयरवेज को भारत के आकाश का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया था जिससे उन्हें पूरे भारत का चक्कर लगा कर दक्षिण पूर्वी देशों में जाना पड़ता था । इसके अलावा कई माह तक पूरी सीमा पर भारत की फौज खड़ी कर दी गयी थी, जिसकी वजह से पाकिस्तानी फौज को भी पूरी सीमा पर तैनात होना पड़ा था और सिर्फ इतने में ही बिना युद्ध लड़े पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी थी और उनकी कंगाली में आटा ही खत्म हो गया था, गीला तो दूर की बात है । . ऐसे कम से कम 100 तरीके हैं । यानी जैसा पाकिस्तान हमारे साथ कर रहा है वैसा ही हम भी उसके साथ कर दें तो बिना युद्ध लड़े ही पाकिस्तान घुटनों पर होगा और उसके कई टुकड़े भी हो सकते हैं । लेकिन यह सब करने के लिये सरकार के पास मजबूत इच्छाशक्ति होनी चाहिये । जिस पार्टी के महासचिव ‘ओसामा जी’ जैसे शब्द का प्रयोग करते हों और यह सोचते हों कि इससे भारत के मुस्लिम प्रसन्न हो कर कांग्रेस को वोट देंगे तो वो भारत के मुस्लिम समुदाय को गैर पढ़ा लिखा समझते हैं और खुलेआम उनको आतंकवादी कह रहे हैं । ओसामा जी कह कर दिग्विजय ने अपनी और कांग्रेस की पोल खोल दी है जो मुस्लिम समुदाय को फुसलाने के लिये हिंदू आंतकवाद का जहरीला नाटक खेल रही है । कांग्रेस और दिग्विजय का एक शब्द ‘ओसामा जी’ ने पर्दाफाश कर दिया है । कांग्रेस मुस्लिम समुदाय को आतंकियों का हितेषी बहुत पहले से मान रही है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वह अफजल गुरू को बहुत पहले ही फांसी पर लटका देती । कांग्रेस को डर है कि ऐसा करने से उसका मुस्लिमवोट बैंक नाराज हो जायेगा । जो सरकार एक भी आतंकी को आज तक सजा नहीं दे सकी और मुस्लिम वोट के लिये हिंदू उग्रवाद का झूठा नाटक खेल रही हो, वह क्या पाकिस्तान के खिलाफ कोयी कदम उठायेगी ।

के द्वारा:

स्नेही एस० पी० सिंह जी ,,मे आपकी सारी असहमतियों से सहमत हूँ ,,परन्तु एन असहमतियों को उत्पन्न करने वाला कौन है क्या एक सच्चा भारतीय ?स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही भारत की रणनीति हमेशा आत्मरक्छात्मक रही है और आज भी है इस रणनीति के लिए कौन जिम्मेदार है ?क्या परमाणु युद्ध का डर केवल केवल भारतीयों को ही है ,अमेरिका ने लादेन को मारते समय यह क्यों नही सोचा जबकि उसी ने शंका प्रकट की थी की अलकायदा के पास आणविक हथियार हैं फिर क्यों नही उसने लादेन या अलकायदा से समझौता कर लिया स्थितियों को काबू किया जाता है उनके स्म्क्छ हथियार डालने में समझदारी नही होती ,,इसका सबसे ज्वलंत उद्धरण इजराएल है आज विश्व में एक मात्र यहूदी देश पूरे स्वाभिमान के साथ खड़ा है तो यह वहां के दृढ़ राजनीतिज्ञों नीतियों की देन है ,,जबकि भारत ने हमेशा शरणार्थियों के प्रति लचीला रुख अपनाया जिसके कारण देश की जनसंख्या का समीकरण ही बदल गया आज देश में रोज एक सैनिक सरकार की उदारवादी एवं समझोतावादी नीति के कारण मरता है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? भारत ने शुरू से ही समझोतावादी नीतियों को अपनाया चीन युद्ध पाकिस्तान युद्ध दोनों में ही समझोते हुए ,,परिणति आपके सामने है,, चीन समझोता जिसका दंश और भी तीव्रतर होता जा रहा है शिमला समझोते का क्या हस्र हुआ इससे भी आप अवगत होंगे इसके लिए क्या भारतीय जनता दोषी है और उन बंदी हुए सैनिकों का दोष शायद यही था कि वह वीरता से लड़े अगर वह सरकार के समझौतावादी दृष्टीकोण से लड़ते तो शायद वह बंदी न हुए होते और भारत समझोता करने की स्थिति में ही नही होता वह तो केवल शर्तों को मानने के लिए बाध्य होता ,,अगर स्व० लाल बहादुर शाश्त्री जैसा प्रधानमंत्री देश को न मिलता तो आज न जाने किन किन समझोते में भारत फंसा होता ,,काश्मीर और चीन समस्या दिन प्रतिदिन विकट होती जा रही है काश्मीर कभी सुप्त ज्वालामुखी की भाँती खामोश रहता है जो अनुकूल समय पाकर पूरी शक्ति से फूट पड़ता है ,,,क्या भारत में आज तक किसी पार्टी ने दो तिहाई बहुमत नही प्राप्त किया अगर किया तो फिर यह समस्या आज तक क्यों बनी हुई है इसके लिए कौन जिमेदार है क्या एक सच्चा भारतीय या फिर .....?आज काश्मीरी ब्रह्मण अपने ही देश में निर्वासितों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं क्या इसके लिए भी देश भक्त जनता दोषी है ? आपने कहा की देश में गद्दार किस्म के लोग हैं आप अक्छरसहसत्य कह रहे हैं परन्तु इनको प्रश्रय देने वाला कौन है क्या भारतीय जनता ?आज अगर गिलानी और दिग्गी लादेन की पैरोकारी कर रहे हैं तो इसको पोषित करने वाला कौन है ,,क्या इन दोनों के बयानों से राष्ट्र द्रोह की झलक नही दिख रही है और अगर दिख रही है तो इन्हे और इन जैसे अन्य गद्दार किस्म के लोगों के ऊपर रास्ट्रद्रोह का मुकदमा कायम कर त्वरित गति से न्याय क्यों नही किया जाता ,,मुम्बई के आरोपियों को जिन्हें कब का हैंग कर देना चाहिए उन्हें स्वास्थ्य लाभ हेतु सच्चे भारतीय कर दातावों की परिश्रम से देय राशि को पानी की तरह बहाया जा रहा है क्या इसके लिए भारतीय जनता दोषी है ?गिलानी और दिग्गी जिनके ऊपर सरकार की तरफ से रास्त्र द्रोह का मुकदमा कायम कर के त्वरित सजा दे दी जाए तो (इन गद्दार किस्म के लोगों के मस्तिष्क में गद्दारी शब्द आये ही नही गद्दारी करने की बात तो बहुत दूर है ,,अभी तक भारतीय सरकार ने ऐसे कितने लोगों को हैंग किया ? क्या स्व० इंदिरा जी के हत्यारे ही देशद्रोही थे ? आये दिन भारत में अलगाववादियों एवं आतंकवादियों के हाथों हजारों लोगों की जान जा रही है उनकी जान की कोइ कीमत नही है ) जब तक सरकारें वोट की राजनीति में उलझ कर देश की अस्मिता एवं सम्प्रभुता के साथ समझौता करती रहेंगी तब तक वैश्विक परिदृश्य हमारे अनुकूल नही होगा ....जय भारत

के द्वारा:

भाई अश्वनी कुमार जी सबसे पहले तो आप ब्लोगर आफ दी वीक बनने पर बधाई स्वीकार करे - पर एक बात बिलकुल ही समझ में नहीं आती की आलोचना के नाम पर घूम फिर कर सारी बाते सरकार के हिस्से में आती हैं क्या आपने कभी यह समीक्षा करने की कोशिस की है कि भारत और अमेरिका में पकिस्तान के रिश्तों में क्या बुनियादी अंतर है सामरिक दृष्टि से एशिया में अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए और चीन पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका को किसी न किसी को तो दोस्त बनाना पड़ेगा और इसीलिए पकिस्तान को वह अपने वैतनिक दोस्त के रूप में पालता है और अरबो डालर की सहायता देता रहता है इसीलिए उसने लादेन को पाकिस्तान के अन्दर फौजी कार्यवाही करके मारा जिसके खात्मे के लिए वह अब तक पकिस्तान को अरबों डालर का भुगतान कर चुका है ! अब रही बात भारत की तो भारत इस प्रकार की कार्यवाही करने में तो सक्षम है (जैसा कि जनरल वी के सिंह ने भी कहा है ) परन्तु क्या भारत के ऐसा करने में विश्व समुदाय भारत का साथ देगा यह तो बहुत दूर की कौड़ी होगी पर जो पकिस्तान समर्थक गद्दार किश्म के लोग देश के अंदर विराज मान है वे लोग क्या किसी कार्यवाही का समर्थन न भी करे पर क्या वह लोग शांत भी रह सकते है क्या देश दंगो की आग में नहीं जलने लगेगा - और पकिस्तान के साथ जैसी भौगोलिक स्तिथिति है वह आप भी जानते है - तीसरी बात पाकिस्तान जैसे बेहूदे देश से जो परमाणु शक्तिसंपन्न भी है से युद्ध की दशा में परमाणु हमले की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता - इस लिए भाई मेरे ऐसी कार्यवाहियों में भारत और अमेरिका की तुलना नहीं करनी चाहिए - क्योंकि जिस प्रकार से हमारे देश में प्रत्येक तीसरा व्यक्ति हाकिम या डाक्टर है किसी भी बीमार को बिना मांगी सलाह दे देता है उसी प्रकार से लोग समारिक महत्त्व के मुद्दों पर बिना मांगी अपनी सलाह अवश्य देतें हैं " पर उपदेश कुशल बहुतेरे " फिर भी आपके सुन्दर लेख के लिए बधाई --- एस.पी.सिंह,मेरठ

के द्वारा: s p singh s p singh

पारीक जी, सादर वन्देमातरम, मैं कुछ आपसे सहमत हूँ और कुछ अश्विनी जी से. अमेरिका ने अपने सबसे बड़े दुश्मन को निपटा दिया. इसके लिए उसने पाकिस्तान की दो कौड़ी की संप्रभुता को भी, जिसे जीवित रखने के लिए वो सालाना ३ अरब डॉलर देता है, को अपमानित करने में कोई कसार नहीं छोडी. आप का कहना ठीक है की दुश्मन के साथ कोई मुरव्वत नहीं दिखानी चाहिए. - अश्विनी जी का कहना भी ठीक है की अमेरिका के अपने फायदे नुकसान हैं. अपने हित हैं. दुनिया जानती है की लादेन को सोवि़त रूस के खिलाफ खड़ा करने वाला अमरीका ही था. इसके अलावा बहुत से लोग दुनिया में ऐसे भी हैं जो यह मानते है की (मुस्लिम देशों के अलावा) २००१ में वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर, पेंटागन आदि पर किया गया हमला, खुद अमरीका ने ही करवाया था और इस पूरी योजना में लादेन भी उसके साथ था, क्योंकि वह तो पहले से ही अमेरिकी एजेंट रहा है. इसपर दिस्कोवेरी चैनल ने बकायदा एक डोकूमेंट्री भी दिखाई थी. इस सब के पीछे आतंक और हथियार के विश्वस्तरीय व्यापर की बात कही गयी थी. - जिस लादेन के मरने पर आज भारत में भी खुशियाँ मनाई जा रही है वहीँ अमेरिका ने यह कह कर की अमेरिका पर २००१ में हुए हमले और मुम्बई हमले की तुलना नहीं की जा सकती भारत को दो टूक जवाद दे दिया की अपनी लड़ाई अपने दम पर लड़ो, हमारे अपने हित हैं. उस हित में पाकिस्तान अगर फिट होता है तो आपके लिए हम पाकिस्तान को नही छोड़ सकते. - अब यह तो भारत की शर्मीली सरकार को सोचना है की वो पाकिस्तान की गीदड भभकियों से डरती है या मोस्ट वांटेड २० आतंकियों के खिलाफ कुछ करती है. . उपाय तो तमाम हैं, जैसे को तैसा की नीति से बिना एक गोली चलाये ही पकिस्तान को उसकी औकात दिखाई जा सकती है. लेकिन तमाम जख्म खाने के बाद भी पाकिस्तान से नए जख्म खाने के लिए अगर भारत सरकार तैयार है तो इससे यही जाहिर होता है की भारत में छद्म लोकतंत्र है. पूरा जनमानस पाकिस्तान के खिलाफ है लेकिन मात्र एक वोट देने के अधिकार को आप लोकतंत्र नहीं कह सकते हैं क्योंकि हम सिर्फ वोट देने तक ही सीमित हैं. सरकार की नीतियां देशहित में नहीं है. क्या ही अच्छा होता की कम से कम नीतियों के मामले पर जनता में पोल ही करवा लेते .

के द्वारा:

परम स्नेही महोदय ,,प्रथम आप इस बात को ध्यान में रखें की ब्लागिंग की तुलना किसी भी तरह से खोजी पत्रकारिता से न करें ,लगभग हर ब्लॉगर जिसके पास अपने समाजिक एवं पारिवारिक दायित्व हैं उसका सम्यक निर्वहन करने के उपरान्त ही ब्लॉग के लिए कुछ समय दे पाता है, अब वह नवीन है या पुरातन लेखक यह कभी ध्यान नही दे पाता ,,(प्यार और वार(युद्ध) में सब जायज''यह आपका यह कथन ) भारतीय संस्कृति का द्योतक नही है ,,लेकिन यह मेरा विचार है,, आप इससे सहमत हों यह आवश्यक नही है ,,""युद्ध एवं प्यार दोनों के ही मानक एवं नियम सनातन भारतीय संस्कृति ने निर्धारित किये हैं जिससे लगभग सभी भारतीय जो खुद को भारतीय कहने में गर्व का अनुभव करते हैं सहमत होंगे ,,""प्यार की आक्रामक परिणति का समाचार आपको विभिन्न सूचना स्रोतों के माध्यम से प्राप्त होता रहता है,,अगर आप उक्त समाचारों/कदाचारों से सहमत हैं,,तो वह आपके व्यक्तिगत विचार हैं भारतीय संस्कृति के विचार नही ,,और जहां तक जागरण सम्पादक मंडल की बात है ,,तो आप असहमति एवं विचारों को जागरण सम्पादक मंडल से साझाँ करने के लिए पूर्णरूपेण स्वतंत्र हैं नीचे (हमसे संपर्क करें ) यह लिखा हुआ है उस पर हिट करके आप जागरण जंक्शन को अपनी असमति से अवगत करवा सकते हैं ,,जहां तक मेरी व्यक्तिगत सोच जो की पुर्णतः स्पस्ट है ,,मे राज भाषा में लिखता हूँ इसका सीधा अर्थ है की मुझे अपनी मात्री भूमि इसकी सनातनी संस्कृति पर गर्व है और जीवन परयन्त्र रहेगा मेरा हर लेख अथवा कविता या किसी भी तरह की कोइ भी रचना पूरी तरह भारतीय संस्कृति में आकंठ डूबी रहेगी ..........................जय भारत

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आदरणीय पारीख जी ..... सादर अभिवादन ! मैं मानता हूँ की जागरण के संपादक मंडल में बेवकूफ और मुर्ख लोग भरे पड़े है , काश की उनमे से एक भी अगर आपकी तरह जरा सा भी समझदार और दूरंदेशी होता तो आज यह नोबत कतई नहीं आती ..... अब जागरण के संपादकों का अखबार -वखबार से क्या वास्ता , उनको क्या पता की अखबार में पहले क्या चीज छप चुकी है और क्या नहीं .... आपने तो हम ब्लागरो की आँखे ही खोल दी है , किरपा करके अपनी इस टिप्पणी को जागरण फीड बैक पर भी चस्पा कर दे , ताकि सम्पादक महोदय भी आपकी विद्वता का लोहा मान जाए ...... और अब अपना और हमारा कीमती वक्त मत खोटा कीजिये तुरंत ही ऐसी बातो से युक्त नई -२ बातों वाला लेख लिख मारिये अपने लादेन पर जिनको की आज तक हम जानते ही नहीं ..... मेरी तरफ से सप्ताह का अगला ब्लागर बनने की अग्रिम शुभ कामनाये ! :)

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

लादेन प्रकरण के बारे में इतना छिछला और सतही लेख पढ़ कर निराशा हुई क्या कहना चाहते हैं आप की उसे जिन्दा क्यों नहीं पकड़ा ; मार क्यों नहीं दिया आदि-इत्यादि बातें ऐसी है जैसी लोगों में सनसनी लाने के लिए हमारी टीवी चेनलें करती हैं और मजे की बात है की आपने खुद इसका जवाब भी दे दिया; हालाँकि मैं इस से सहमत नहीं हूँ. दरअसल इस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को अंतर्राष्ट्रीय परिद्रिस्य की समझ ही नहीं है और उन्हें यह भी मालूम नहीं है की पिछले एक दशक में आतंकवाद के समीकरण कितने बदल गए हैं यह कहना की उसे जिन्दा पकड़ते तो अमरीका "बेपर्दा" हो जाता एक बचकानी सोच है. जहाँ तक अमेरिका के "बर्बर कारनामों" आपने जिक्र किया सो उस कहावत को न भूलें कि प्यार और वार(युद्ध) में सब जायज है. फिर चाहे अम्रीका हो या तालिबान या फिर पोल पोत हो या वियात्कोंग कोई किसी से कम नहीं. हाँ ये बात सही है कि भारत एक सोफ्ट स्टेट है और इस वजह से आतंक का ईजी टार्गेट है. कुल मिला कर आपका यह पूरा लेख कोई गहराई की बात नहीं कहता फिर भी सर्वाधिक पढ़ा गया क्योंकि अधिकांस लोग सतही और चौंकाने वाली बातों को पसंद करते हैं वरना इसमें एक भी कोई नयी बात नहीं. अलग-अलग अख़बारों में यह सब पहले ही बिकरा पसरा पड़ा है क्या ख़ास बात दी आपने. जरा हमें भी बताएं. oppareek43

के द्वारा:

आपका लेख वास्तविकता को समझ पाने की आपकी योग्यता को दर्शाती है | प्रथम तो यह समझ लेना चाहिए कि अमेरिका एक सबसे खुदगर्ज और केवल अपने लिए जीने वाला देश है | अमेरिका के सारे सिधांत अपने भले के लिए है | अमेरिका और पाकिस्तान की हमजोली आजकी नहीं बड़ी पुरानी है | अमेरिका के मापदंड अपने लिए कुछ और तथा दुसरे के लिए कुछ और है | सी आई ऐ का नेट वर्क सालों गुप्त रूप से गुप्त रूप पता नहीं कितने देशों में अपनी मदद करने वाली सरकारों को स्थापित व सत्ता से हटता रहता है | आज तक जितने विध्वंशकारी विश्व स्तर पर पैदा हुए वे इसी खुफिया तंत्र की दें है | ओबामा मुंबई पर हुए हमले के बाद भारत आ चुके है पर पाकिस्तान को मदद वे देते ही नहीं रहे बल्कि बढ़ाते रहे | वे अपने ऊपर हुए हमले को तो आतंकवाद मानते है पर यदि भारत पर ऐसा हमला हो तो वे उसको वैसीं श्रेणी में नहीं रखते | हम और दुनिया केवल उतना सच जानते है जो अमेरिका मीडिया बताता है | वे कह दे कि उनके हेलीकाप्टर किसी रडार में नहीं आते तो हम मान लेते है | यह भी मान लेते है कि सील कमांडर जैसा विस्मयकारी कोई नहीं | यह कार्यक्रम अबके कोई शौर्य का प्रतीक न होकर पाकिस्तान कि आई एस आई व सी ई ऐ कि मिलीभगत भगत है | अमेरिका को पाकिस्तान ने पूरी तरह बता दिया था और ओबामा ने भी आराम से तिथि निश्चित की थी | हलिकोप्टर को आने की पूरी इज़ाज़त ही नहीं सुरक्षा भी दी गयी और मेरा मानना है यदि कुछ उलट सुलट होता तो उने सुरक्षित वापिस भी कर दिया जाता | यह तो भूल ही जाना चाहिए कि अमेरिका विश्व मानवता या सर्भोमिकता के किसी सिधांत को मानता है | वह विश्व पर दादागिरी करता है | तेल के खजानों पर नज़र गडाए रखता है | जहाँ तेल हे वहां का आवाम बदहाल है | अपना काम जब तक वहां के हुक्मारों से निकला उनको अय्याशी व ऐश अमेरिका ही करता है | अगर किसी तेल उत्पादक टेड़ा हो गया अपनी दम ठोंकने लगा तो मानव अधिकारों कि दुहाई देता घुस जाता है अपनी मिलिटरी लेकर | सबसे ज्यादा मानव संहरक पैदा करना उन्हें बेचने कि जमीं तैयार करना उसके ghinone एजेंडे में से एक है जय भारत www.jrajeev.jagranjunction.com

के द्वारा:

आदरणीय अग्रज मैं आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ | जब इस देश की सत्ता भोग पिपासु, रीढविहीन, सामर्थ्यहीन लोगों के हाथ से नहीं ली जायेगी तब तक किसी तरह के सुधर की कोई संभावना नहीं है ..... - किन्तु इस घुटन के परिवेश में रहने के लिए बाध्य जनता ने ही अपने तुच्छ वैयक्तिक हितों की पूर्ती करते करते और अपने मूर्खतापूर्ण निर्णयों, जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद और अदूरदर्शिता से ही ये विवशताएँ खरीदी है | यहाँ परिवर्तन लाना भी कठिन है क्योंकि कुछ जहर प्रवित्ति तक में घुल-मिल गया है | यहाँ मत देशी मदिरा की थैलियों, बकरों के मांस, नोटों, छद्म सहानुभूति और अन्य भौतिक साधनों से तोला जाता है | और मेरा मानना है की जब तक इस देश में वैचारिक सुधार नहीं होगा तब तक प्रत्येक प्रकार के सुधर का प्रयाश पूर्णरूपेण या आंशिक रूप से असफल होता रहेगा | और इसके किये कठोर दंड संहिता बनायी जाय | और त्वरित निर्णय लिए जाए तो सुधार संभावी है | --------------------------------------------------------------------------------------------------------- राष्ट्रहित में जनजागरण हेतु आपके प्रयास प्रशंसनीय और अनुकरणीय है ............. आपके इस पावन प्रयास के लिए आपका का ह्रदय से आभार ..... ---------------------------------------------------------------------------------------------------------

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: chaatak chaatak

स्नेही अग्रज, सादर अभिवादन, लादेन का पाकिस्तान में सैन्य ठिकाने के पास अपनी सुरक्षित पनाहगाह में मारा जाना अमरीका की ताकत और उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट प्रमाण है एक तरफ जहां भारतीय राजनीती आधी सदी से भी ज्यादा गुजर जाने के बाद भी बिना रीढ़ के कीड़े की तरह लोट रही है वहां अमरीका ने अपने लोगों का सर गर्व से ऊंचा उठाया. आज कोई भी अमरीकी पूरी दुनिया में अपने आपको सबसे ज्यादा सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है क्योंकि उसे पता है उसके राजनयिकों के लिए अमेरिका और अमरीकी दो सर्वोपरी हैं और वह अपने नागरिको के जान, माल और सम्मान के लिए किसी भी नापाक के घर में घुस कर अपना द्रोही समाप्त कर सकता है. काश यही प्रतिबद्धता हिन्दुस्तान के पास होती और हम भी देश के दलाओं को नहीं बल्कि ओबामा जैसे किसी राष्ट्रवादी को चुन पाते! आमीन !! वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak chaatak

एनडीटीवी इंडिया वाशिंगटन, सोमवार, मई 2, 2011 ओसामा बिन लादेन को दफना दिया गया है। अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि लादेन को समुद्र में पूरे इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया गया है। अधिकारी ने कहा कि इस्लाम के अनुसार मृत व्यक्ति को 24 घंटों के भीतर दफनाया जाता है। इसलिए लादेन को समुद्र में ही दफनाने का फैसला किया गया। उसका यह भी कहना था कि यह भी काफी मुश्किल था कि कोई देश दुनिया के सबसे बड़े आतंकी लादेन के शव को लेने के लिए आगे आता। इस प्रक्रिया में काफी देर भी हो सकती थी। जिस अधिकारी ने यह जानकारी दी वह दफनाए जाने के सही स्थान का खुलासा नहीं कर पाया। उधर, सउदी अरब ने लादेन का शव लेने से इनकार किए जाने की खबर भी थी।अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि समुद्र में ओसाम को दफनाने के पीछे एक महत्वपूर्ण वजह यह भी थी कि ओसामा बिन लादेन के चाहने वाले स्मारक न बना पाएं। इस डर की वजह से भी अमेरिका ने लादेन को समुद्र में दफनाने की योजना बनाई। भाषा वाशिंगटन, मंगलवार, मई 3, 2011 लादेन के मरने की खबर की पुष्टि होने के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, ‘हमने उसे पकड़ ही लिया’। कल अमेरिकी सेना के विशेष दस्ते ने पाकिस्तान के अबोताबाद शहर में एक अभियान के दौरान लादेन को मार गिराया था।आंतरिक सुरक्षा और आतंकनिरोधी विभाग के राष्ट्रीय उप सुरक्षा सलाहकार के अनुसार, जैसे ही लादेन के मरने की सूचना की पुष्टि हुई, अल-कायदा प्रमुख के खिलाफ होने वाले इस सैन्य अभियान से व्यक्तिगत तौर पर जुड़े ओबामा ने कहा, ‘‘हमने उसे पकड़ लिया।’’ ओबामा ने अपने राष्ट्रपति काल में ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का लक्ष्य रखा था और उन्होंने सोमवार को अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया। व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव जे कर्नी का कहना है, ‘आप सभी जानते हैं ओबामा जब सिर्फ राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी थे तभी से वह जानते थे कि वह राष्ट्रपति बनने के बाद ओसामा बिन लादेन के खिलाफ कैसा कदम उठाएंगे।’ अगस्त 2007 में ओबामा ने कहा था अगर हमारे पास आतंकियों के खिलाफ सबूत हैं तो मुशर्रफ कार्रवाई करें या ना करें हम जरूर करेंगे। भाषा नई दिल्ली, मंगलवार, मई 3, 2011 कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सोमवार को अमेरिकी सेना द्वारा पाकिस्तान में मारे गए अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में गर्क करने पर अमेरिका की आलोचना की।ओसामा के दफनाए जाने संबंधी प्रक्रिया पर उन्होंने कहा ‘‘कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो, धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए उसे दफनाया जाना चाहिए।’’ उन्होंने कहा कि ओसामा के दफनाने के मामले में अमेरिका को इस्लामी प्रथा एवं परंपरा का निर्वहन करना चाहिए था।...................जय हो कांग्रेस की अरे कुछ सीख लो कहीं ऐसा न हो की समय निकल जाए ,,...........विनाशकाले विपरीत बुद्धि .....

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यह लिस्ट फेसबुक पर अंकिता बहन ने दी है मुझे, आप लोग भी देखिये. 1. दाउद इब्राहिम: दाउद पर पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की शह पर 1993 में मुंबई में बम धमाकों का आरोप है। यह कराची से ही अपने अपराध और आतंक का नेटवर्क चलाता है। 2. हाफिज सईद: लश्‍कर ए तैयबा के संस्‍थापक सईद पर 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों की साजिश का आरोप है। 3. जकीउर रहमान लखवी: 26/11 के मामले में पाकिस्‍तान की जेल में बंद है। 2006 में मुंबई में ट्रेनों में हुए विस्‍फोट में भी शामिल था। 4: मसूद अजहर: जैश ए मुहम्‍मद का संस्‍थापक मौलाना मसूद अजहर 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमलों का आरोपी है। 5: युसूफ मुजम्मिल: लखवी की गिरफ्तारी के बाद लश्‍कर के भारत विरोधी कारनामों की कमान संभालता है। जम्‍मू कश्‍मीर के छत्‍तीसिंहपुरा नरसंहार मामले में शामिल होने का आरोप। इस घटना में 35 सिखों की हत्‍या कर दी गई थी। 6: साजिद मीर: 26/11 के हमलावरों को फोन पर आदेश दिया कि मुंबई के चबाद हाउस में एक भी आदमी जिंदा नहीं बचना चाहिए। पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद: मौलाना मसूद अजहर, वर्ष 2000में संगठन का निर्माण। 2002 में पाकिस्तान सरकार ने इसपर प्रतिबंध लगाया। अमेरिकी पत्रकार डैनियल पर्ल की हत्या का जिम्मेदार। भारतीय संसद पर हमले का आरोपी। भारत, यूरोपियन देश व अमेरिका समेत कई देश इसे प्रतिबंधित कर चुके हैं। लश्कर-ए-तैयबा या जमात-उद-दावा: हाफिज मुहम्मद सईद, वर्ष 2002 से ही इसकी मौजदूगी की सूचना। 1985 में लाहौर में निर्माण। 2006 में पाकिस्तान में दंगे और 26/11 को मुंबई में आतंकी हमला करने का मुख्य आरोपी। इसके अन्य बड़े आतंकी थे जकीउर्ररहमान लखवी और जरार शाह। हिज्ब-उल-मुजाहिदीन: जम्मू-कश्मीर में हमला करने वाले आतंकी समूहों में से सबसे बड़ा। कुल ३२ उप-संगठन हैं इसके। इसकी शुरुआत कश्मीर घाटी में १९८९ में मास्टर अहसान डार ने की थी। वर्तमान में इस संगठन में 1500 आतंकी हैं और इसका चीफ सैयद सलाहुद्दीन है। हरकत-उल-अंसार या हरकत-उल-मुजाहिदीन: दो पाकिस्तानी आतंकी समूहों को मिलाकर बनाया गया है। पीओके की राजधानी मुजफ्फराबाद स्थित संगठन का आतंकी नेता मौलना सआदतउल्लाह खान। १९९७ में पहली बार आया दुनिया की नजर में। अल बद्र: जम्मू-कश्मीर में ही सबसे ज्यादा आतंकी गतिविधियां। जून १९९८ में निर्माण।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि ओसामा का मारा जाना अल कायदा और अन्य आतंकी संगठनों से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मनमोहन सिंह ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेष तौर पर पाकिस्तान से सभी आतंकी संगठनों की गतिविधियों पर पूर्ण पाबंदी लगाने की दिशा में काम करने को कहा है। प्रधानमंत्री की ओर से जारी बयान के अनुसार मैं इसका एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में स्वागत करता हूं। जिससे अल कायदा और अन्य आतंकी संगठनों को निर्णायक आघात पहुंचेगा। मनमोहन सिंह का यह बयान अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा की उस घोषणा के चंद घंटों के भीतर सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे वांछित आतंकी ओसामा पाकिस्तान की राजधानी से 120 किलोमीटर दूर ऐबटाबाद में मारा गया। मनमोहन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेष तौर पर पाकिस्तान को ऐसे संगठनों की गतिविधियों को पूरी तरह से समाप्त करने की दिशा में मिलकर काम करना चाहिए जो सभ्य समाज के समक्ष खतरा उत्पन्न करते हैं और निर्दोषच्बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की हत्या में संलग्न हैं (एक समाचार )।और एक विचार .........................भाई ऐसा भी क्या जल्दी थी जरा देर से ही बोलते भारत का रूख तो पूरी दुनिया ही जानती है ,,शेर के बाजू में कुत्ते के चलने से कुत्ता शेर नही हो जाता दहाड़ और औं औं में अंधे को भी साफ़ फर्क दिखाई पड़ जाता है ,,ख़ैर ठीक है रश्म अदायगी भी जरूरी है,,लेकिन यह कहते हुए शायद पायजामे का नाड़ा जरूर ढ़ीला हो गया होगा ............................जय भारत

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प्रिय अश्विनी जी सादर वंदेमातरम ! आपका यह ओजस्वी लेख हमें भारत के स्वर्णयुग की याद कराता है जिसके बारे में अब भूले से भी मीडिया और शिक्षाविद नहीं सोचते । कथित धर्मनिरपेक्षता ने हमें हमारे गौरव चिन्हों और इतिहास को भी भूलने पर विवश कर दिया है । . कुछ तथ्य में इसमें और जोड़ना चाहूंगा कि धर्म का अर्थ हमारे यहॉं पूजा पाठ, मंदिर या कर्मकाण्ड से कभी नहीं लिया गया । धर्म का अर्थ तमाम स्मृतियों और विधि आधारित पुस्तकों में कर्तव्य से है । चाहे वह मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारदस्मृति हो या जीमूतवाहन और विज्ञानेश्वर की हिंदू विधि पर लिखी टीकाएं हो या दायभाग और मिताक्षरा हिंदू विधि हो, या फिर श्रीकृष्ण के मुख से निकली गीता हो, या चाणक्य का अर्थशास्त्र हो या फिर माननीय सुप्रीमकोर्ट की सनातत धर्म पर अवधारणा हो सभी जगह इसे कर्तव्य ही माना गया है । फिर चाहे वह राजा का धर्म हो या मंत्री का या प्रजा का या पिता, पुत्र, माता, पति-पत्नी का धर्म/कर्तव्य हो । . लोग कहते हैं आधुनिक राजनैतिक सिद्धांतों का प्रतिपादन प्रचीन रोम के मनीषियों ने किया था लेकिन उनसे भी बहुत पहले भारत में गणतंत्र की अवधारणा का प्रयोग योगेश्वर श्री कृष्ण ने सर्वसम्मति से उग्रसेन को द्वारिका का राजा चुन कर किया था । आज जो बिहार अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है वहां बुद्ध के समय में तमाम वैशाली, लिछवी आदि गणराज्य थे । . महाभारत और हमारे तमाम दूसरे गं्रथों में धर्म का एक अर्थ यह भी बताया गया है की जिस व्यवहार की आप दूसरों से अपेक्षा करते हैं आपको भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये । तमाम तथ्य हैं, लेकिन कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों के लिये सनातन संस्कृति मात्र एक भगवा संस्कृति है जिसकी तुलना वे फासीवाद और हिंदू आतंकवाद तक से करने में नहीं चूकते । शिक्षा का राजनीतिकरण करने और इलेक्ट्रानिक मीडिया को भ्रष्टाचार की कमाई में हिस्सा देने भर से वे हमारे गौरवशाली इतिहास को नहीं छिपा पायेंगे । आज भ्रष्टाचार और तानाशाही का दूसरा नाम कांग्रेस है । जल्द ही देशवासी इन्हें सबक सिखायेंगे । अन्ना हजारे, बाबा रामदेव जैसे लोगों ने भारतवासियों में राजनैतिक जनजागरण की अलख जगा दी है । समय अब बदलेगा, लोगों को बहुत दिन तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है ।

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चर्चित जी ,,या तो मै अपने भावों को ठीक से व्यक्त नही कर पाया या फिर आपने ध्यान से पढ़ा ही नही ,,मेरा पूरा लेख ही कट्टरता को खंडित करने की भावना पर केन्द्रित है किसी भी पन्थ की कट्टरता का मै विरोध करता हूँ,,जहां तक जातिगत (जिसे आपके शब्दों में ,, हिन्दुओं की पृथकतावादी सामाजिक व्यवस्था) की बात है तो यह जातिगत वैमनस्यता तो बहुत बाद में आयी और तभी आयी जब भारत में वैदेशिक आक्रमणों ने भारतीय संस्कृति को संक्रमित करना शुरू किया जिसके वशीभूत होकर कुछ राजनीतिग्य (जी हाँ उन्हें राजनीतिग्य ही कहूंगा क्योंकि आज के सारे राजनीतिज्ञों के सारे गुण उनमे विद्यमान थे ) न्याय सूत्र जाति के सम्बन्ध में कहता है''समानप्रसवात्मिका जाति:''अर्थात उत्पत्ति का प्रकार एक जैसा हो जैसे :-उद्भिज,अंडज,पिंडज,उष्मज ,,यही चार जातियां हैं ,,अब वर्णों को देखते हैं वर्ण भी चार ही थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,शूद्र,,यही चार वर्ण है जिन्हें भारतीय संस्कृति के स्वर्ण काल में मान्यता प्राप्त थी ,,लेकिन वर्ण कोइ बंधन न होकर स्वेच्छानुकर्ण मात्र था ,,आप जिस वर्ण को चाहे उस वर्ण को अपना सकते थे ,,मेने अपने लेख में इसी बात पर अत्याधिक बल दिया है की भारतीय धर्म एवं संस्कृति को संक्रमित किया गया है (अर्थात वैदिक या सनातनी धर्म ग्रंथों के साथ छेड़ छाड़ की गयी है जिसका प्रमाण तो हम नही दे सकते जिस तरह अनेकों स्न्क्रमनों का प्रमाण नही दे सकते ,,लेकिन संक्रमित तथ्यों का पता हमे आसानी से लग जाता है क्योंकि सनातन ग्रन्थ तर्क विहीन नही थे परन्तु जिस तरह वर्ण व्यवस्था का कहीं कहीं वैमनस्यता का भाव के साथ उल्लेख हुआ है उससे यही प्रतीत होता है की इस तरह के तर्कों को जान बूझकर सनातनी ग्रंथों पर आरोपित किया गया है ,,अन्यथा सनातनी ग्रंथों में वर्ण का इतना लचीला रुख हमे देखने को नही मिलता उदाहरणार्थ :-ऐतरेय ऋषि दास पुत्र थे परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की ,,ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे परन्तु विद्यार्जन के पश्चात ऋषियों ने आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया,, राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया,,राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया ,,त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे,,वेदों में अति परिश्रमी कठिन कार्य करने वाले को शूद्र कहा गया है,,चार वर्णों से अभिप्राय है कि मनुष्य द्वारा चार प्रकार के कर्मों को रूचि पूर्वक अपनाया जाना,,परन्तु यह सामाजिक वैमनस्यता तो वैदेशिक आक्रमणों के पश्चात ही आयी ,,और जिसे मेने अपने केख में व्यक्त करने का प्रयाश किया जो शायद सार्थक नही हुआ अन्यथा आप भ्रमित नही होते,,और जहां तक जय हिंद या जय भारत कहने की बात है तो भाव सम रहने पर वन्दे मातरम ,जय भारत ,जय हिंद कुछ भी कहें मूल में तो देश प्रेम ही है और हमेशा रहेगा .........जय भारत

के द्वारा:

अश्विनी जी ;जय भारत ! सामान्यतः मैं जय हिंद !लिखता हूँ किन्तु आप लोंगों ने यह उच्चकोटि का शब्द कांग्रेसियों को आरक्षित कर आवंटित कर निषिद्ध कर रखा है ! मैं ' जय हिंद ' को किसी की जागीर नहीं मानता इसीलिये खुलकर प्रयोग करता हूँ ! भारतीय संस्कृति की आपकी चिंता से हर सच्चा भारतीय सहमत होगा ,मैं भी हूँ ! किन्तु हमारे पूर्वज हिन्दू राजा ना तो मूर्ख थे ना ही कट्टर ना होने के कारण कमजोर !हिन्दुओं की स्वयं की सामाजिक व्यवस्था ही इतनी पृथकतावादी है की बाहरी लोंगों को कुछ अधिक नहीं करना पड़ता !यदि कट्टरपंथ ही हितकर है तो सबसे बड़े कट्टर पंथी [ और सर्वमान्य उग्रपंथी ] किस इस्लामिक देश या भूटान नेपाल जैसे किसी भी अन्य धर्माधारित देश को आप विकास पथ पर तेजी से बढ़ते देख पा रहे हैं ?जो हिन्दू इतने संकीर्ण हैं की अपने ही भाइयों में उंच नीच करने की हानि नहीं देख पा रहे हैं वे देश की एकता के लिए जरूरी धर्मनिरपेक्षता जैसी सोच तक तो पंहुंच ही नहीं सकते !हिन्दू केवल अपनी ही जातपांत के दायरों को तोड़ एक हो पायें तो किसी अन्य आक्रान्ता का भय ही ना रहे ! इन सब कमियों के बाबजूद हिंदुत्व सबल है ! अक्षुण है !अभेद्य है !और रहेगा !

के द्वारा: Charchit The PM in Waiting Charchit The PM in Waiting

स्नेही अग्रज, सर्वप्रथम तो जागरण जंक्शन मंच पर इस ब्लॉग को पोस्ट करने के लिए आपको कोटिशः धन्यवाद! हम जिस तरह के माहौल में जी रहे हैं वहां कई मत व् धर्म के लोग अपने वास्तविक धर्म को भूल कर सिर्फ धर्म के दलाल (प्रोमोटर कहने से भी इस शब्द के वास्तविक अर्थ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता) बने हुए हैं. धर्म को दूकान और उसकी प्रवंचना को उत्पाद बनाकर सिर्फ मार्केटिंग करने पर जुट गए हैं. अधिकतम लोगों की तो सहज बुद्धि भी नष्ट हो गयी प्रतीत होती है. ऐसे में न्यायलय को अब धर्म और धार्मिक प्रचार की कानूनी हदें तय करना पड़ रहा है ऐसा लगता है जैसे दरबान (न्यायालय) सम्राट (धर्म) को क्या करना चाहिए का हुक्म सुना रहा हो और ये सब उन्ही दुकानदारों के कारण हो रहा है जो अपने धर्म को ठेले पर लादे खरीदारों को स्कीम और प्रलोभन दे रहे हैं कि उन्ही का उत्पाद सबसे अच्छा है. वे मासूम जिन्हें शायद धर्म से कोई सरोकार ही नहीं धार्मिक राजनीती के भेंट चढ़ते हैं और फिर भी न दुकानदारों को शर्म आती है न हत्यारों को. अच्छी पोस्ट द्वारा महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रकाश डालने पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

अश्विनी जी, सादर वन्देमातरम, संग्रहणीय लेख के लिए आपका आभारी हूँ. इस लेख से तमाम उन लोगों को हमारे महापुरुषों के विचार धर्मपरिवर्तन पर पता चलेगे, इसके अलवा माननीय सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या नजरिया है, यह भी पता चलता है. आज धर्मपरिवर्तन के द्वारा देश के एक और विभाजन का कुत्सित खेल मिशनरियां खेल रही है. लोगों को इसके बारे में पता नहीं. अगर कोई इसके बारे में बात करता है तो तुरंत उसे    भगवावादी घोषित कर दिया जाता है. राष्ट्रवाद को फासीवाद कह कर धिक्कारने वालों को तो निसंदेह विदेशों से पैसे मिल रहे हैं क्यों की १७५७ प्लासी के युद्ध से आज तक हमें बिके हुए लोगों के दर्शन होते रहते हैं लेकिन अब उनकी एक राजनीतिक विचारधारा भी है जिसने माओवाद, बंगलादेशी घुसपैठ, चर्च के भारत तोडो कार्यक्रम में मदद देना बहुत पहले से शुरू कर दिया था.  जय भारत. 

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सबसे पहले बहुत दिनों बाद मंच में उपस्थित हुए उसका सुस्वागतम, बसंत पंचमी की शुभकामनाये माँ सरस्वती का आशीर्वाद आप पर बना रहे | बहुत एक दम सच लिखा है आप ने, प्यार नुमाइश की चीज नहीं है | ये तो इबादत की तरह होनी चाहिए | तेरा तुझ को अरपर्ण | और जिस दिल में प्यार हो वो खुदब खुद सारे जहाँ से प्यार करने लगता है | और आप ने जिस रूप में प्यार को जाना है उसमें ही इश्क की सच्ची इबादत कही गयी है | राणे भेज्या विष का प्याला, पीवत मस्त होई॥ इससे बड़ी लगन कुछ हो सकती है जिसमे जीने मरने का भय भी नहीं आज उसी को पहन के निकला हम मस्तों का टोला मेरा रंग दे बसंती चोला ..............................इसे इश्क कहते है जिसमे ख़ुशी ख़ुशी अपनी जान की क़ुरबानी दे दी ............जय भारत जय भारती

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प्रिय अश्वनी भाई ... यह जान कर मन दुःख से भर गया की आपकी प्रिय पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया है .... श्री भगवान से यही सच्चे मन से प्रार्थना है की वोह दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और आपने चरणों में स्थान प्रदान करे और आपको यह असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे ... इस शोक की घड़ी में मेरी आत्मिक स्वेंदनाये ......काश की मैं आपके पास होकर कुछ अपना फ़र्ज़ अदा कर पाता ....इन्ही सब बातो से जीवन की नश्वरता और आदमी के कठपुतली होने का एहसास होता है .... हमारा जिससे भी जितनी देर का संबद्ध होता है ..उतनी देर के लिए ही हमारा उनसे मिलन और साथ हुआ करता है .... आपके दुःख में आपके साथ ... आपका भाई कमल किशोर शर्मा ( राजकमल शर्मा) अपना असली नाम इसलिए लिख रहा हूँ ताकि दूरिया होने के बावजूद आप तक भावनाएं और खुदा तक मेरी प्रार्थना सही रूप में पहुंचे .....

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आदरणीय अग्रज, सादर वंदे मातरम, संस्कृत में एक श्लोक है...जिसका अर्थ है की जंगल में स्वान प्रजाति के लोग (वादी,प्रतिवादी) तभी तक गर्जन करते रहते हैं जब तक वेदांत सिंह की गर्जना नहीं होती...वेदांत की शार्दूल गर्जना को सुनकर सभी मतों के स्वान अपने घरों में घुस जाते है...द्वैत मोक्ष के दो मार्गों (द्वाविमो पुरुषों राज्ञः सूर्य मंडल भेदिनो,योग सन्यास संयुक्तो,रनेश्चाभिमुखो हतः) में है और बाकि सब तो अद्वैत...मुझमे,तुझमे,खडग,खंभ में घट घट व्यापित राम कहत प्रहलाद पिता से .....भईया दो को एक प्रकृति भी नही कर पाती बिना एक का अंत किये ,एक का तो अंत होना ही है (देश प्रेम और देश द्रोह एक ही शरीर में नही रह सकते ) लेकिन (जय हो) देश के इन टाप के मैथमैटीसियनों की द्वय को एक करने पर आमादा हैं ,,भईया एक से अनेक हो सकता है लेकिन अनेक से एक होने में एक या कुछ का अंत तो होना ही है ......निःसंदेह और इसमें जिसको शक हो...क्या वह मनुष्य कहलाने योग्य है ....केन मानुषे होएते पारो .....भैया छठी का दूध याद दिला दिया...अब भी जिन नामुरादों की आँख न खुले तो उसका इलाज सिर्फ राम जी के बाण ही कर सकते हैं

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क्या बात है अग्रज !, आज तो इस लेख की पंक्तियों ने साबित कर दिया कि अग्रज का कोई जवाब नहीं| क्या व्याख्या की है आपने द्वि शब्द की आशा है कि सुविधा और दुविधा को छोड़ कर कुछ लोगों को एक सही सोच मिल सकेगी 'यदि उन्होंने अपने ज्ञान चक्षुओं को बंद करने की कसम नहीं खा राखी होगी'| एक और मजे की बात है बन्धु, हमारे इस अग्रज-अनुज सम्बन्ध से प्रेरित होकर किसी ने किसी को 'सहोदरा' शब्द से संबोधित किया है अब ये उनकी दुविधा थी या सुविधा लेकिन 'काकः काकः, पिकः पिकः' वाली उक्ति जरूर चरितार्थ हो गई| अधिक जानकारी के लिए मनोज जी से संपर्क करें| ये तो वही हो गया- 'अब्बाजान महरूम हो गए और भाईजान ने मुझे विरासत से मरहूम कर दिया |' ;) ;) :)

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नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' आदरणीय अग्रज, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

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अश्विनी जी सादर वंदेमातरम । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बंग्लादेशियों की घुसपैठ को एक महत्वपूर्ण जनहितयाचिका में देश पर आक्रमण माना है । उसकी जानकारी दे रहा हूं । . सरवदानंद सोनवाल बनाम भारत संघ ए आई आर 2005 सुप्रीमकोर्ट पेज नं0 2920 . इस मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने कहा - ”आधुनिक काल में युद्ध की अवधारणा में काफी परिवर्तन आ गया है । हमारे संविधान निर्माताओं ने अनु0 355 में ‘आक्रमण’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया है । लाखों की संख्या में असम में अवैध बंग्लादेशियों का घुसना, मतदाता बन जाना, नौकरियां पा जाना असम पर अक्रमण है जिससे केन्द्र सरकार को इसे संरक्षा प्रदान करना चाहिये । केन्द्र अपने इस कर्तव्य में विफल रही है ।“ . आज बंग्लादेशी घुसपैठियों को हमारे नीतिनिंयता अतिथि देवो भव की निगाह से देख रहे हैं और उनको एक मुश्त अपना वोट बैंक बनाने के लिये ललायित हैं । पिछले 40 साल से यही नीति बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार की भी रही और यह समस्या उन्हीं की पैदा की हुयी है जैसे नक्सल समस्या । उन्होंने बंग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता बना दिया और बंगाल की सत्ता का सुख भोगते रहे । . देश की बढ़ती जनसंख्या पर आज भी कोई बहस करने को राजी नहीं है। लगता है जैसे यह मुद्दा कभी राष्ट्रहित में था ही नहीं और आने वाले वर्षों में कभी होगा भी नहीं । आंखें खोलने वाले लेख के लिये आभारी हूं ।

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अश्विनी जी सर्वधर्म समभाव अथवा सद्भाव एक अलग मुद्दा है, और वोट की राजनीति के तहत विदेशी आबादी (बांगलादेशी) घुसपैठियों को हमारी जमीन में लाकर बसाए जाने का चोर नेताओं का कुत्सित प्रयास निहायत ही अलग प्रकार की राष्ट्रीय समस्या । घुसपैठियों की बढ़ती आबादी भारतीय मुसलमानों को भी नहीं पचती । वो कोई इनकी रोजी-रोटी में चार चांद नहीं लगाते कि उनके प्रति कोई आकर्षण रखेंगे । मात्र जो लोग सीमा पर तस्करी में संलग्न हैं, वही इनसे सांठ-गांठ रखते होंगे । ये कहा जाय कि बांग्लादेश की सीमा पर धीरे-धीरे उनकी आबादी इतनी बढ़ चुकी है कि अधिकांश स्थानों पर ये स्थानीय स्तर पर बहुसंख्यक हो चुके हैं, तथा हिन्दू-मुस्लिम (भारतीय) दोनों के लिये सिरदर्द बन चुके हैं । इनके पास वोटर आईडी सहित नागरिकता के सारे औजार हैं, इसलिये अब बाहर कर पाना भी संभव नहीं रहा । अब नए घुसपैठियों को पनाह भी यही देते हैं, तथा भ्रष्ट तंत्र की मिलीभगत से नागरिकता दिलवाने का उपाय भी । आज की तारीख में यह एक बहुत बड़ी समस्या है, और इस समस्या को मुसलमानों ने नहीं बल्कि हुक्मरानों ने, जिसमें हिन्दू मुसलमान सभी हैं, खड़ा किया है । मैं किसी के प्रति पक्षपात नहीं बल्कि अपनी राय रख रहा हूं । इसमें कोई संदेह नहीं कि घुसपैठिये अधिकांश मुस्लिम हैं, लेकिन यदि कोई और आबादी बांग्लादेश में होती, तो शायद घुसपैठिये उस सम्प्रदाय के होते, और कुछ हद तक होंगे भी । बांग्लादेश के हिन्दू शरणार्थी या हिन्दू घुसपैठिये भी हमारे मित्र किसी प्रकार से भी नहीं हैं ।

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प्रिय अश्विनी कुमार जी, आपकी व्यथा हर भारतीय के दिल की व्यथा है| ये भारत भूमि अपने ही लोगों की हत्या के लिए अभिशापित प्रतीत होती है| यहाँ एक ओर देशभक्त पैदा होते हैं तो दूसरी ओर जयचंद भी| आज फिर से वही कहानी दोहराई जा रही है भारत माता के इस पावन उद्यान पर फिर से कुल्हाड़ी की नज़र है और उद्यान की कुछ कमज़ोर शाखाओं ने अपने आपको बेंट बनाने को प्रस्तुत कर रखा है| जाने अनजाने हम लक्ष्मण का चरित्र भूल चुके हैं और \'ज्ञानी विभीषण\' की राह चल पड़े हैं ऐसे विवेक से तो स्वयं विधाता भी रक्षा नहीं कर सकते| लगता है समयचक्र फिर से अपनी जगह पर आ गया है बस एक अंतर कि विभीषण राम के कुनबे में जन्मा है| जय भारत-जय भारती !

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प्रिय अश्विनी जी ! जैसा में जो कुछ आप के लेख का मूल समझ पाया ये रहा कि, भूत और वर्त्तमान शासन नीति और शिक्षण व्यवस्था ने गरीबी और समाज में विषमांग मौद्रिक वितरण को जन्म दिया है ...... और जैसे कि आजकल हम जिस विचारधारा में बहने लगे हैं, उसके परिणामस्वरूप ... सेवा और व्यापारिक संस्थानों में तार्किक, वैश्लेषिक, सैद्धांतिक और सिद्धांतों के अनुप्रयोग के अपर्याप्त ज्ञान एवं अल्प नवोत्पदाकता रखने वाले सदस्यों के संख्या में वृद्धि हो रही है और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा और इच्छित गुणात्मकता और संपन्न कार्य की गुणात्मकता में अंतर बढ़ता जा रहा है | अतः प्रत्येक दशा में इसमे सुधर लाने के लिए प्रय्श्रत होना पड़ेगा नहीं तो ..... समाज का एक बड़ा हिस्सा जीवन स्टार के निम्नतम मानकों के नीचे आ जाएगा और जिसके परिणाम स्वरुप समाज में अनैतिकता और अपराध में वृद्धि हो जायेगी .. एक सार्थक लेख के लिए आपका आभार

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

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